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जुल्फें

उफ़्फ़ येह जुल्फें तेरी  जब भी सवरताँ हूँ  ये ऊलघ सी जाती है  क्यूंकि इन में मैं घुम हो जाता हूँ | उफ़्फ़ क्या तेरा उस दर्द को छुपाना  वो आशुओं का रोक पाना तेरा हो सके तो पी जाओं बस इन्ही हसरतों में क्यू में जिये जाऊँ || उफ़्फ़ मार डालेगी तेरी ये जुदाई तेरी हाथों की ये चूडियाँ ये तेरे दिल का सुकून ये तेरी मेरे से दूरियाँ |

वक़्त

किसी को कुछ समाज में आये  तो वो मुझे भी बताओ, क्यू में ये ज़िंदगी बस  ऐसे ही गुजरता जाऊ | दिन होता है कब तक होगा एक ना एक दिन, कभी इस्को भी ढल जाना है | एक काला सा अंधेरा है जिसमे सबको गुम जाना है, तो क्यू ना मैं इस ज़िंदगी का दिया भुजा दूं | ना मैं ख़ुद को कोई सज़ा दू ना किसी से कोई दुआ लूँ , बस इस वक़्त के हर पल को खवाबों की तरह भुला दु |

तारे

जितने आसमा में तारे है  उतने मेरे दिल के टुकड़े ना होते  काश वो चाँद मिल जाता  तो रोज़ के दुखड़े ना होते | तोड़ना था तो बस तुम बता देते हम तो हॅसी म़ें इसे गवा देते ना तुमको देते कोई दोष ना खोते ख़ामखा अपना होश | अब जब येह खता हो गयी तुमसे ना फिर मिलना कभी हमसे क्यूंकि जब कभी मिलोगे तुम हमसे| इतना रुला देंगे की कभी नज़रें ना मिला सकोगे खुदसे |

हकीकत

भुलाना चाहा तेरी यादों को इस दिल से जिस दिन से , क्यूँ खवाबों में हकीकत  बन के आने लगे उस दिन से |

राहें

अंधेरें बहुत घने है यहाँ  ना सूरज ना रोशिनी का निशां है यहाँ आँखें तो खुली है पर देख नहीं पाती है राहें तो कई है पर क्यूँ मंज़िल मिल नहीं पाती है कहते है लोग राहों पे चलकर नहीं मिला आजतक किसी को कुछ जहाँ से चले थे वही लौटकर आता है सबकुछ तो क्यूँ मैं भटकू इन राहों में जब लौट आना मुझे जहाँ मैं खड़ा ना देखूँ किसीको ना सोचूँ किसीको फिर भी आज मैं क्यू खुद से ही लड़ा |

चैन

आज मैने किसी को चैन से सोते देखा! खुले आस्मा के नीचे सुकून से सोते देखा! नींद में मदहोशी में उसे कुछ गुनगुणते देखा! बेफिक्री सा उसे कुछ खुद ही खुद में गाते देखा! पूछना तो चाहा उससे बहुत कुछ मैने ! पर उसे बस आराम से चैन से सोते देखा ! फिर मैने आसमा में चाँद तारों को देखा ! उनको भी सच्ची आज़ादी में झूमते देखा ! हवाओं को पेडों से कुछ बातें करते देखा ! उनको बस मैने ज़िंदगी पे मुस्कुराते देखा ! फिर मैने खुद में अपने आप को झांक के देखा ! अपने अंदर के इंसान को बस यू ही मरते देखा!!

आँखें

कितना समझाया कितना सुनाया फिर भी दिल ये समझ ना पाया । मेरी इन् खूबसूरत आँखों को  फिर इसने बेवजह ही इतना रुलाया ।

प्यार

प्यार एक से होता हैं, हजारों से नहीं! मिलते तोह इस ज़िंदगी में हजारों हैं, बस वोही क्यू "एक" किस्मत में नहीं!!

ख़वाब

देखा था जो ख़वाब  वोह बड़ा ही हसीं था  तू थी मेरे साथ  वोह पल बड़ा खुशनसीब था ।  जैसे ही जागे थे उस हसीं ख़वाब से ना थी तू क़रीब वोह ख़वाब बड़ा ही बदतमीज़ था ।

'मैं'

टूटता हूँ बिख़र जाता हूँ रोज़ सुबह उठकर  फ़िर से वोही मैं वोही 'मैं' बन जाता हूँ| ना सोता हूँ ना ही जाग पाता हूँ फ़िर से सपनो में कहीं खो सा जाता हूँ | ना भटक़ पाता हूँ ना मंज़िल तक पहुँच पाता हूँ बस इन्ही अनजान राहों में कुछ गुम सा हो जाता हूँ | सोचना क्या है बस यही तोह भूल जाता हूँ  खुदही में 'खुद' को दूंढ़ नहीं पाता हूँ |

परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी अकेला छोड़ देती है जब भी कर लेता हूँ हसीन आँखे बंद मेरी चलती है हर घडी हर वक़्त मेरे कुछ बोलू इसे तो सुनती है हर बात मेरी न करती है सवाल न माँगती कोई जवाब बस ऐसी ही ये भोली सी परछाई मेरी छोड़ कर चले जाये जब सब साथ मेरा तनहा नहीं रहने देती मुझको यह परछाई मेरी बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी.... समझाऊ भी तो क्या इसको अब मैं समजती नहीं है कोई बात यह मासूम परछाई मेरी ख़बर तोह सब है इसको मेरी पर जाने क्यों चुप रहती है ये परछाई मेरी समझती तो सब है पर बस बोल नहीं पाती है यह बेजुबां परछाई मेरी आखिर दिल तो मेरा ही है इसके सीने में इसलिये तो बस खामोश सी रहती है ये परछाई मेरी...

दिल यह मेरा कहता है

एक दर्द सा दिल में होता है जब तोड़ के इसको जाये कोई | फिर टूटे इस दिल को समझाऊ कैसे  अब रखना ना किसी से आस कोई | क्यों जीता फिर में वही आस लिए आईगी वोह फिर पास मेरे | रखेगी वोह मेरे काँधे पे सर फिर दर्द ना होगा साथ मेरे | पर दिल यह मेरा कहता है अब ना आना उस को लौट कर | सॊजा उसकी यादों के संग मौत की अब तू फरियाद कर |

दिल

इक दिल है ये मेरी सुनता ही नहीं  ये लब भी मेरे इसको बोले कुछ नहीं  मुझसे बातें किया करता ये तनहा रातों को  फिर रोया करता याद कर भूली यादों को  क्यों धड़कता है तू किसी की चाह में जब मिलना नहीं वोह तुझे ज़िन्दगी की राह में कहता मेरी बातें अब जुबां पे मत लाना किसी को भी अब मेरी बातें ना बताना कहता की रहना नहीं इसे अब मेरे सीने में जब मकसद ही ना रहा ये ज़िन्दगी जीने में इक दिल यह मेरा दिल मेरी सुनता ही नहीं अब लब भी इसे बोले कुछ नहीं...

परछाई

ज़िन्दगी जब मिली थी  तब हर ख़ुशी साथ थी  काले घने बादलों में  वोह रौशनी साथ थी  चाहे कितनी भी धूप हो वोह बारिश की नमी साथ थी उदासी के चंद लम्हों में हलकी सी हँसी साथ थी लेकिन जब हुआ सामना ज़िन्दगी की सचाई से दर्द भी था तन्हाई भी साथ थी मौत के उन् अंधेरों में बस मेरी परछाई ही साथ थी |

और ना सताओ

अकेला हूँ मुझे और ना सताओ  चैन से रहने दो मेरे पास ना आओ  ग़मों में डूबा हूँ, अब और ना रुलाओ,  रहता हूँ नशे में , अब होश में ना लाओ | ठोकर खाके गिर चुका हूँ, अब कोई ना उठाओ, खो चुका हूँ सब कुछ , अब और ना बहलाओ | अकेला हूँ मुझे और ना सताओ चैन से रहने दो मेरे पास ना आओ गुम हो गया अंधेरो में , अब उजाला ना दिखाओ , दर्द का आदि हो चुका हूँ , ज़ख्मों पे अब मरहम ना लगाओ | भूल गया हुआ जो कुछ , अब उसे याद ना दिलाओ, बहुत दूर जा चुका हूँ, मुझे अब भूल जाओ | अकेला हूँ मुझे और ना सताओ चैन से रहने दो मेरे पास ना आओ शोलों पे चलना सिख गया हूँ, रास्तों पे फूल ना बिछाओ, झूठे खवाबों में गुम हो गया हूँ , हकीक़त की याद मत दिलाओ | तन्हाइयों की ख़ामोशी सुनता हूँ , अब महफ़िलो में मत बुलाओ , मौत का इंतज़ार कर रहा हूँ, अब जीना मत सिखाओ | अकेला हूँ मुझे और ना सताओ चैन से रहने दो मेरे पास ना आओ.. .

कैसे ?

कैसे बताएं उसे की कितना चाहते हैं , चाहकर भी उससे बता नहीं पायेंगे !  कैसे समझाएं उसे की कितना प्यार करते हैं , प्यार करें तोह भी वोह समझ नहीं पायेंगे !  कैसे यकीन दिलाएं की मर जायेंगे उसके बिना , मर भी जाएँ तोह यकीन नहीं दिला पायेंगे ! कैसे कहें दिल से की भूल जाए उसे , भूल भी जाएँ तोह भूल नहीं पायेंगे !