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ऊड़ता हुआ मुसाफिर

ऊड़ता हुआ मुसाफिर  क्या कभी देखा है तुमने ? क्या कभी सोचा है की मौत को भी देखा होगा उसने करीब से ? क्या बातें करता होगा हवाओं से क्या कभी सोचा है तुमने ? हर नए सफ़र में क्या कहनीं लिखता होगा क्या कभी यकीन किया होगा उसपे ? तकलीफों में भी आज़ादी का एहसास होता है उसे कभी महसूस किया है तुमने ? जंगलों में भटकने पर भी कभी अच्छा लगा है तुम्हे ? बारिश की उन् तीखी बूंदों से कभी गुफ्तगू की है तुमने ? शारीर से बहार भी कभी किसी को महसूस किया है तुमने ? जितनी भी घेराई में उतरता है उतना ही पानी कम लगता है उसे ! इन् सबका एहसास कौन कर सकता है यह कभी पुछा है तुमने ? इन् सभी एहसासों को करीब से जीया है हमने !!