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जुल्फें

उफ़्फ़ येह जुल्फें तेरी  जब भी सवरताँ हूँ  ये ऊलघ सी जाती है  क्यूंकि इन में मैं घुम हो जाता हूँ | उफ़्फ़ क्या तेरा उस दर्द को छुपाना  वो आशुओं का रोक पाना तेरा हो सके तो पी जाओं बस इन्ही हसरतों में क्यू में जिये जाऊँ || उफ़्फ़ मार डालेगी तेरी ये जुदाई तेरी हाथों की ये चूडियाँ ये तेरे दिल का सुकून ये तेरी मेरे से दूरियाँ |

तारे

जितने आसमा में तारे है  उतने मेरे दिल के टुकड़े ना होते  काश वो चाँद मिल जाता  तो रोज़ के दुखड़े ना होते | तोड़ना था तो बस तुम बता देते हम तो हॅसी म़ें इसे गवा देते ना तुमको देते कोई दोष ना खोते ख़ामखा अपना होश | अब जब येह खता हो गयी तुमसे ना फिर मिलना कभी हमसे क्यूंकि जब कभी मिलोगे तुम हमसे| इतना रुला देंगे की कभी नज़रें ना मिला सकोगे खुदसे |

हकीकत

भुलाना चाहा तेरी यादों को इस दिल से जिस दिन से , क्यूँ खवाबों में हकीकत  बन के आने लगे उस दिन से |

राहें

अंधेरें बहुत घने है यहाँ  ना सूरज ना रोशिनी का निशां है यहाँ आँखें तो खुली है पर देख नहीं पाती है राहें तो कई है पर क्यूँ मंज़िल मिल नहीं पाती है कहते है लोग राहों पे चलकर नहीं मिला आजतक किसी को कुछ जहाँ से चले थे वही लौटकर आता है सबकुछ तो क्यूँ मैं भटकू इन राहों में जब लौट आना मुझे जहाँ मैं खड़ा ना देखूँ किसीको ना सोचूँ किसीको फिर भी आज मैं क्यू खुद से ही लड़ा |

चैन

आज मैने किसी को चैन से सोते देखा! खुले आस्मा के नीचे सुकून से सोते देखा! नींद में मदहोशी में उसे कुछ गुनगुणते देखा! बेफिक्री सा उसे कुछ खुद ही खुद में गाते देखा! पूछना तो चाहा उससे बहुत कुछ मैने ! पर उसे बस आराम से चैन से सोते देखा ! फिर मैने आसमा में चाँद तारों को देखा ! उनको भी सच्ची आज़ादी में झूमते देखा ! हवाओं को पेडों से कुछ बातें करते देखा ! उनको बस मैने ज़िंदगी पे मुस्कुराते देखा ! फिर मैने खुद में अपने आप को झांक के देखा ! अपने अंदर के इंसान को बस यू ही मरते देखा!!

आँखें

कितना समझाया कितना सुनाया फिर भी दिल ये समझ ना पाया । मेरी इन् खूबसूरत आँखों को  फिर इसने बेवजह ही इतना रुलाया ।

प्यार

प्यार एक से होता हैं, हजारों से नहीं! मिलते तोह इस ज़िंदगी में हजारों हैं, बस वोही क्यू "एक" किस्मत में नहीं!!

ख़वाब

देखा था जो ख़वाब  वोह बड़ा ही हसीं था  तू थी मेरे साथ  वोह पल बड़ा खुशनसीब था ।  जैसे ही जागे थे उस हसीं ख़वाब से ना थी तू क़रीब वोह ख़वाब बड़ा ही बदतमीज़ था ।

परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी अकेला छोड़ देती है जब भी कर लेता हूँ हसीन आँखे बंद मेरी चलती है हर घडी हर वक़्त मेरे कुछ बोलू इसे तो सुनती है हर बात मेरी न करती है सवाल न माँगती कोई जवाब बस ऐसी ही ये भोली सी परछाई मेरी छोड़ कर चले जाये जब सब साथ मेरा तनहा नहीं रहने देती मुझको यह परछाई मेरी बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी.... समझाऊ भी तो क्या इसको अब मैं समजती नहीं है कोई बात यह मासूम परछाई मेरी ख़बर तोह सब है इसको मेरी पर जाने क्यों चुप रहती है ये परछाई मेरी समझती तो सब है पर बस बोल नहीं पाती है यह बेजुबां परछाई मेरी आखिर दिल तो मेरा ही है इसके सीने में इसलिये तो बस खामोश सी रहती है ये परछाई मेरी...

दिल यह मेरा कहता है

एक दर्द सा दिल में होता है जब तोड़ के इसको जाये कोई | फिर टूटे इस दिल को समझाऊ कैसे  अब रखना ना किसी से आस कोई | क्यों जीता फिर में वही आस लिए आईगी वोह फिर पास मेरे | रखेगी वोह मेरे काँधे पे सर फिर दर्द ना होगा साथ मेरे | पर दिल यह मेरा कहता है अब ना आना उस को लौट कर | सॊजा उसकी यादों के संग मौत की अब तू फरियाद कर |

दिल

इक दिल है ये मेरी सुनता ही नहीं  ये लब भी मेरे इसको बोले कुछ नहीं  मुझसे बातें किया करता ये तनहा रातों को  फिर रोया करता याद कर भूली यादों को  क्यों धड़कता है तू किसी की चाह में जब मिलना नहीं वोह तुझे ज़िन्दगी की राह में कहता मेरी बातें अब जुबां पे मत लाना किसी को भी अब मेरी बातें ना बताना कहता की रहना नहीं इसे अब मेरे सीने में जब मकसद ही ना रहा ये ज़िन्दगी जीने में इक दिल यह मेरा दिल मेरी सुनता ही नहीं अब लब भी इसे बोले कुछ नहीं...

परछाई

ज़िन्दगी जब मिली थी  तब हर ख़ुशी साथ थी  काले घने बादलों में  वोह रौशनी साथ थी  चाहे कितनी भी धूप हो वोह बारिश की नमी साथ थी उदासी के चंद लम्हों में हलकी सी हँसी साथ थी लेकिन जब हुआ सामना ज़िन्दगी की सचाई से दर्द भी था तन्हाई भी साथ थी मौत के उन् अंधेरों में बस मेरी परछाई ही साथ थी |

साँसें

जाने क्यों अब भी चल रही है मेरी "साँसें" शायद ज़िन्दगी को पता नहीं के  किसी के लिए हम अपनी "जान " दे चुके हैं !

ऊड़ता हुआ मुसाफिर

ऊड़ता हुआ मुसाफिर  क्या कभी देखा है तुमने ? क्या कभी सोचा है की मौत को भी देखा होगा उसने करीब से ? क्या बातें करता होगा हवाओं से क्या कभी सोचा है तुमने ? हर नए सफ़र में क्या कहनीं लिखता होगा क्या कभी यकीन किया होगा उसपे ? तकलीफों में भी आज़ादी का एहसास होता है उसे कभी महसूस किया है तुमने ? जंगलों में भटकने पर भी कभी अच्छा लगा है तुम्हे ? बारिश की उन् तीखी बूंदों से कभी गुफ्तगू की है तुमने ? शारीर से बहार भी कभी किसी को महसूस किया है तुमने ? जितनी भी घेराई में उतरता है उतना ही पानी कम लगता है उसे ! इन् सबका एहसास कौन कर सकता है यह कभी पुछा है तुमने ? इन् सभी एहसासों को करीब से जीया है हमने !!

दर्द

एक अजीब सा दर्द है, जो बिन बुलाये चला आता है  ज़िन्दगी का एहसास कराके, ना जाने कहाँ चला जाता है  ख़ुशी से ज्यादा ना जाने क्यूँ , इस दर्द में मज़ा आता है  जाने क्या कशिश है इसमें , की इसे में भुला नहीं पाता हूँ  ऐसा लगता है इससे मेरा , न जाने कितने जन्मो का नाता है  इसलिए तो यह हमेशा ,अपनों की तरह बिन बुलाये चला आता है !!

कैसे ?

कैसे बताएं उसे की कितना चाहते हैं , चाहकर भी उससे बता नहीं पायेंगे !  कैसे समझाएं उसे की कितना प्यार करते हैं , प्यार करें तोह भी वोह समझ नहीं पायेंगे !  कैसे यकीन दिलाएं की मर जायेंगे उसके बिना , मर भी जाएँ तोह यकीन नहीं दिला पायेंगे ! कैसे कहें दिल से की भूल जाए उसे , भूल भी जाएँ तोह भूल नहीं पायेंगे !