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परछाई

ज़िन्दगी जब मिली थी 
तब हर ख़ुशी साथ थी 

काले घने बादलों में 
वोह रौशनी साथ थी 

चाहे कितनी भी धूप हो
वोह बारिश की नमी साथ थी

उदासी के चंद लम्हों में
हलकी सी हँसी साथ थी

लेकिन जब हुआ सामना
ज़िन्दगी की सचाई से

दर्द भी था
तन्हाई भी साथ थी

मौत के उन् अंधेरों में
बस मेरी परछाई ही साथ थी |




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'मैं'

टूटता हूँ बिख़र जाता हूँ
रोज़ सुबह उठकर 
फ़िर से वोही मैं
वोही 'मैं' बन जाता हूँ|

ना सोता हूँ
ना ही जाग पाता हूँ
फ़िर से सपनो में
कहीं खो सा जाता हूँ |

ना भटक़ पाता हूँ
ना मंज़िल तक पहुँच पाता हूँ
बस इन्ही अनजान राहों में
कुछ गुम सा हो जाता हूँ |

सोचना क्या है
बस यही तोह भूल जाता हूँ 
खुदही में
'खुद' को दूंढ़ नहीं पाता हूँ |


तारे

जितने आसमा में तारे है 
उतने मेरे दिल के टुकड़े ना होते 
काश वो चाँद मिल जाता 
तो रोज़ के दुखड़े ना होते |

तोड़ना था तो बस तुम बता देते
हम तो हॅसी म़ें इसे गवा देते
ना तुमको देते कोई दोष
ना खोते ख़ामखा अपना होश |

अब जब येह खता हो गयी तुमसे
ना फिर मिलना कभी हमसे
क्यूंकि जब कभी मिलोगे तुम हमसे|
इतना रुला देंगे की कभी नज़रें ना मिला सकोगे खुदसे |

आँखें

कितना समझाया कितना सुनाया
फिर भी दिल ये समझ ना पाया ।
मेरी इन् खूबसूरत आँखों को 
फिर इसने बेवजह ही इतना रुलाया ।