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परछाई

ज़िन्दगी जब मिली थी 
तब हर ख़ुशी साथ थी 

काले घने बादलों में 
वोह रौशनी साथ थी 

चाहे कितनी भी धूप हो
वोह बारिश की नमी साथ थी

उदासी के चंद लम्हों में
हलकी सी हँसी साथ थी

लेकिन जब हुआ सामना
ज़िन्दगी की सचाई से

दर्द भी था
तन्हाई भी साथ थी

मौत के उन् अंधेरों में
बस मेरी परछाई ही साथ थी |




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परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी
अकेला छोड़ देती है
जब भी कर लेता हूँ
हसीन आँखे बंद मेरी

चलती है हर घडी
हर वक़्त मेरे
कुछ बोलू इसे तो
सुनती है हर बात मेरी

न करती है सवाल
न माँगती कोई जवाब
बस ऐसी ही
ये भोली सी परछाई मेरी

छोड़ कर चले जाये
जब सब साथ मेरा
तनहा नहीं रहने देती
मुझको यह परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी....

समझाऊ भी तो क्या
इसको अब मैं
समजती नहीं है कोई बात
यह मासूम परछाई मेरी

ख़बर तोह सब है
इसको मेरी
पर जाने क्यों चुप
रहती है ये परछाई मेरी

समझती तो सब है
पर बस बोल
नहीं पाती है
यह बेजुबां परछाई मेरी

आखिर दिल तो मेरा
ही है इसके सीने में
इसलिये तो बस
खामोश सी रहती है ये परछाई मेरी...


दिल यह मेरा कहता है

एक दर्द सा दिल में होता है
जब तोड़ के इसको जाये कोई |
फिर टूटे इस दिल को समझाऊ कैसे 
अब रखना ना किसी से आस कोई |

क्यों जीता फिर में वही आस लिए
आईगी वोह फिर पास मेरे |
रखेगी वोह मेरे काँधे पे सर
फिर दर्द ना होगा साथ मेरे |

पर दिल यह मेरा कहता है
अब ना आना उस को लौट कर |
सॊजा उसकी यादों के संग
मौत की अब तू फरियाद कर |


जुल्फें

उफ़्फ़ येह जुल्फें तेरी 
जब भी सवरताँ हूँ 
ये ऊलघ सी जाती है 
क्यूंकि इन में मैं घुम हो जाता हूँ |

उफ़्फ़ क्या तेरा उस दर्द को छुपाना 
वो आशुओं का रोक पाना तेरा
हो सके तो पी जाओं
बस इन्ही हसरतों में क्यू में जिये जाऊँ ||

उफ़्फ़ मार डालेगी तेरी ये जुदाई
तेरी हाथों की ये चूडियाँ
ये तेरे दिल का सुकून
ये तेरी मेरे से दूरियाँ |