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परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी
अकेला छोड़ देती है
जब भी कर लेता हूँ
हसीन आँखे बंद मेरी

चलती है हर घडी
हर वक़्त मेरे
कुछ बोलू इसे तो
सुनती है हर बात मेरी

न करती है सवाल
न माँगती कोई जवाब
बस ऐसी ही
ये भोली सी परछाई मेरी

छोड़ कर चले जाये
जब सब साथ मेरा
तनहा नहीं रहने देती
मुझको यह परछाई मेरी

बड़ी अजीब है यह परछाई मेरी....

समझाऊ भी तो क्या
इसको अब मैं
समजती नहीं है कोई बात
यह मासूम परछाई मेरी

ख़बर तोह सब है
इसको मेरी
पर जाने क्यों चुप
रहती है ये परछाई मेरी

समझती तो सब है
पर बस बोल
नहीं पाती है
यह बेजुबां परछाई मेरी

आखिर दिल तो मेरा
ही है इसके सीने में
इसलिये तो बस
खामोश सी रहती है ये परछाई मेरी...



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'मैं'

टूटता हूँ बिख़र जाता हूँ
रोज़ सुबह उठकर 
फ़िर से वोही मैं
वोही 'मैं' बन जाता हूँ|

ना सोता हूँ
ना ही जाग पाता हूँ
फ़िर से सपनो में
कहीं खो सा जाता हूँ |

ना भटक़ पाता हूँ
ना मंज़िल तक पहुँच पाता हूँ
बस इन्ही अनजान राहों में
कुछ गुम सा हो जाता हूँ |

सोचना क्या है
बस यही तोह भूल जाता हूँ 
खुदही में
'खुद' को दूंढ़ नहीं पाता हूँ |


तारे

जितने आसमा में तारे है 
उतने मेरे दिल के टुकड़े ना होते 
काश वो चाँद मिल जाता 
तो रोज़ के दुखड़े ना होते |

तोड़ना था तो बस तुम बता देते
हम तो हॅसी म़ें इसे गवा देते
ना तुमको देते कोई दोष
ना खोते ख़ामखा अपना होश |

अब जब येह खता हो गयी तुमसे
ना फिर मिलना कभी हमसे
क्यूंकि जब कभी मिलोगे तुम हमसे|
इतना रुला देंगे की कभी नज़रें ना मिला सकोगे खुदसे |

आँखें

कितना समझाया कितना सुनाया
फिर भी दिल ये समझ ना पाया ।
मेरी इन् खूबसूरत आँखों को 
फिर इसने बेवजह ही इतना रुलाया ।